Tuesday, 17 August 2010

मैं आतंकवादी क्यूँ बना - an attempt to understand the unexplainable

गर्म सांसें, भीगी आँखें, आश्चर्य मेरे मन में था
अगले ही पल नम ये आँखें और शोक भरा इस दिल में था
क्यूँ हुआ अपने ही साथ किस्मत का ऐसा बदसुलूक
क्यूँ किया अपनों पे ही दुनिया ने ऐसा जुल्म
जिस समाज को माना था मैंने एक देवभूति
क्यूँ उसी ने मांग ली मेरे अपनों की ही आहुति


अब इस पल थी शांत सांसें और क्रोध मेरे मन में था
आँखों में थे रक्त जागे और प्रतिशोध भरा इस दिल में था
जिस दुनिया ने है छीन ली मुझसे मेरे जीवन का सवेरा
क्यूँ न फैला दूं इसके हर कोने में मैं अँधेरा
हमदर्दी का जवाब जिन्होंने हमे दर्द से दिया
अब उन्हें क्या हक़ हो की वो मनाते रहें खुशियाँ


रंगे हुए है जो हाथ मेरे अपनों के ही लहू से
धोना है मुझे अब इन्हें इन्ही कातिलो के खून से!!

2 comments:

ritesh said...

well written.. go juggan go!!

Siddhartha said...

A telling poem. Presents the other side of the moon. A fresh concept and wonderfully executed.
P.S.- Would you mind increasing the font size. My eyes are already watering!